अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...

Sunday, May 20, 2012

परिक्रमा (सुपर कमांडो ध्रुव और एंथोनी) (Story Ad)


*Originally Posted on RC Forums and Website - January 2009

दुनिया अपनी धुरी पर घूमती है....वक़्त घूमता है....ख़ुद को दोहराता है...इंसान प्यादा बना अनजाने शतरंज की बिसात पर किसी अजनबी के आदेशो का गुलाम बना....उसके इशारो पर नाचता करता रहता है....परिक्रमा.


परिक्रमा (सुपर कमांडो ध्रुव और एंथोनी) -

किंग के स्कूल की छुट्टी हुई और वो पास ही स्थित अपने घर की ओर चल दिया. किंग को एक अनजान शख्स विस्मय से देख रहा था....किंग ने उस अजनबी को देखा और सिहर कर अपने चलने की रफ़्तार तेज़ कर दी. शायद किंग के लिए वो अजनबी नही था.

वो अजनबी ख़ुद से बडबडा रहा था.

"ये...कैसे हो सकता है....एंथोनी.....एक जीवित बच्चा...छी-छी!!! बड़ी ढीट आत्मा है..."

पल भर मे ही वो अनजान आकृति किंग के सामने थी.....

"एंथोनी, पहचाना मुझे.....कल रात की ही तो बात है.....तू अपने इस रूप से दुनिया को धोखा दे सकता है पर मुझे नही. अब मै तेरी आत्मा को नरक की सैर करवाऊंगा और अपना गुलाम बनाऊंगा."

कल रात की घटना के बाद से वेनू उर्फ़ सज़ा सतर्क थी इसलिए वो किंग को बचाने तुंरत उस शख्स के सामने पहुँच गई थी.

वेनू - रुक जा दरिन्दे! कल तू अन्धे कुए की आत्माओ को आजाद करने मे सफल हो गया था लेकिन आज सज़ा तुझे अकेले ही सज़ा देगी.

वो शख्स इस नए अनचाहे बदलाव से ठिठका....

"तो तू सज़ा है....तू भी एक महिला की काया मे....बड़ा अजीब शहर है रूपनगर जहाँ भटकती आत्माएं जिंदा शरीरो मे रहती है. नासमझ आत्मा जब तू और एंथोनी मिलकर मुझे नही रोक पाये तो तुझ अकेली की क्या बिसात? कल तू भी बच गई थी आज तुम दोनों को अन्धे कुए मे लटकाकर खूब तड़पाउंगा."

वेनू अब सज़ा के रूप मे आ चुकी थी और उसने पहला वार किया. एक भयानक युद्ध शुरू हुआ...किंग को बचाने के लिए सज़ा उस अनजान आकृति को किसी भी कीमत पर ख़त्म करने पर उतारू थी. क्योकि कल वो उस अदभुत शक्ति के मालिक से लडाई हार चुकी थी....वो भी एंथोनी के साथ रहते. पर सज़ा की कमजोरी यानी वेनू के रूप मे उसका निर्जीव शरीर वहीँ पड़ा हुआ था. जिसपर अब उस शख्स का कब्जा था. वेनू के शरीर को झटका लगते ही सज़ा असहाय हो गई. वह हँसता हुआ किंग की ओर पलटा.

"अब तुझे कौन बचाएगा मेरे छोटे...मासूम एंथोनी?"

बचाने वाला शायद आ चुका था.

"....बन्दे को ध्रुव कहते है."

परिक्रमा (सुपर कमांडो ध्रुव और एंथोनी), Second Story Ad -

एंथोनी और ध्रुव रूपनगर से बहकर गुज़रती रावी नदी के ऊपर उस बड़े निर्माणाधीन बाँध पर एक-दूसरे से जूझ रहे थे. दोनों की मजबूरी उनके चेहरों पर साफ़ झलक रही थी.

ऊपर खड़ी एक आकृति की आवाज़ आई.

"अरे ओ मुर्दे और सर्कस के जोकर....ध्यान रहे तुम मे से कोई एक ही बचना चाहिए वरना....इस बाँध के लिए बने छोटे से रिज़र्वोयर का पानी रूपनगर के कई इलाकों को तबाह करने के लिए काफी है....और....मै तो भूल ही गया था इतनी आत्माएं खुली घूम रही है....बेचारी सब मुझ से बार-बार शहर भर मे आतंक मचाने की गुजारिश कर रही है. अब मुझसे किसी का दिल तो तोडा नहीं जाता.....वैसे वो बुड्ढा बाबा कहाँ है? सुना बहुत पीटा है उसने तुम दोनों को.....हा हा हा हा...."

एंथोनी ने इस गुत्थम-गुत्था को एक बार मे ही ख़त्म करने के लिए ध्रुव को अपनी पूरी ताक़त से मुक्का मारा और ध्रुव उड़ता हुआ बाँध के नीचे जा गिरा. एंथोनी को लगा की ध्रुव बेहोश हो गया...पर अगले ही पल ध्रुव ने अपनी स्टारलाइन उड़ते एंथोनी के पैर मे फसाई और उसी के सहारे एंथोनी को ज़ोरदार किक लगायी. अब दोनों ही फिर से बाँध के बीच के हिस्से पर आ चुके थे. ध्रुव ने स्टारलाइन के झटके से एंथोनी पर भारी पत्थरो की बरसात कर दी. पर ध्रुव जानता था की ऐसे खतरों से बचना एंथोनी के लिए बायें हाथ का खेल है.....एंथोनी तुंरत ही उस ढेर से टेलीपोर्ट होकर ध्रुव के सामने था. एंथोनी ने फिर से ध्रुव पर वार किया और टेलीपोर्ट होकर उसके पास पहुंचा और ध्रुव पर इस तरह लगातार वार करने लगा. एंथोनी के शक्तिशाली वारो के आगे ध्रुव ज्यादा देर नहीं टिका रह सकता था.....ध्रुव इन लगातार हो रहे वारो और एंथोनी को टेलीपोर्ट होने से रोकने के लिए एंथोनी पर बाँध निर्माण कार्य के लिए रखा तारकोल का कनस्टर उडेल देता है....और तारकोल को जल्दी सुखाने के लिए एंथोनी पर हीट-फ्लेयर छोड़ देता है. (एंथोनी वहीँ तक टेलीपोर्ट हो सकता है जहाँ तक उसकी आँखें देख सकती है पर देखने मे बाधा आने पर वो टेलीपोर्ट नहीं हो सकता.) कुछ दिखाई ना देने के कारण एंथोनी इधर उधर हवा मे वार करता हुआ....अपने आप ही बाँध के नीचे आ गिरता है. इस बीच ध्रुव ऊपर खड़ी समस्या से निपटने के लिए सोचना शुरू कर देता है.....

पर एंथोनी की हालत देख.....बाँध के ऊपर खडा वो शख्स गुस्से मे आ गया.

"ऐ मुर्दे....मेरे सामने नाटक मत कर.....कहाँ गयी तेरी नरक वाली ठंडी आग? लगता है की ध्रुव की जान तुझे बहुत ज्यादा प्यारी है. तो ठीक है....वैसे भी रूपनगर के लोग मुझे पसंद नहीं....भारत की जनसँख्या भी बढ़ रही है.....कुछ कम हो जाए तो क्या हर्ज़ है? क्यों ठीक है ना भाई एंथोनी?"

उस शख्स की बातों ने जादू सा असर किया और एंथोनी ने अपनी आँखों के आस-पास की खाल बुरी तरह नोच कर उतार दी....और एक बार फिर ध्रुव तक पहुंचा. मजबूरी वश अब एंथोनी ने ध्रुव पर ठंडी आग का वार किया और ध्रुव तड़प उठा......साथ ही उसका दर्द देख कर तड़प उठा खुद एंथोनी पर वो कुछ नहीं कर सकता था. पहले से ही एंथोनी के वारो से बेहाल ध्रुव पर ठंडी आग जैसे कोडे बरसा रही थी. ध्रुव दर्द से कराह रहा था पर ठंडी आग उसके सोचने समझने की शक्ति भी क्षीण करती जा रही थी......ध्रुव अब कुछ ही पालो का मेहमान लग रहा था.....ध्रुव ने अपनी शक्ति समेटी और एंथोनी के सीने की तरफ कुछ एसिड कैप्सूल छोडे और एंथोनी का दिल दिखने लगा. बिना कोई क्षण गवाए बेहोशी से बंद होती आँखों के साथ ध्रुव ने एंथोनी के दिल के अन्दर तक स्टारलाइन फसाई और स्टारलाइन का दूसरा सिरा बाँध से जा रहे बिजली के तार मे अटका दिया. मुर्दा एंथोनी के दिल मे जैसे उसकी जान बस्ती थी.....दिल को लग रहे बिजली के झटको से मुर्दा कुछ चीखों के साथ बेजान होकर बेहोश ध्रुव के पास आ गिरा.

सुबह होने वाली थी और बेजान एंथोनी का वजूद खतरे मे था......ख़ुशी से ठहाके लगता हुआ वो शख्स निर्जीव पड़े ध्रुव और एंथोनी के पास आया. वो ध्रुव को मारने ही वाला था की तभी उसपर एक उर्जा वार हुआ....दर्द से कराहता हुआ वो वार की दिशा मे पलटा.....वार करने वाली आकृति बोली.

"बस कर गद्दार तंत्रदेव.....तेरे दिन पूरे हुए....ये मासूम शहरी तेरे आतंकवादी साथियों की भेट नहीं चढेगे...."

तंत्रदेव अब दर्द से कराहने के अलावा डर से कांप भी रहा था.

तंत्रदेव - सत्या बाबा....आप????

No comments:

Post a Comment