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Wednesday, May 3, 2017

TWG Update 2017


Still playing TWG, locking horns with the masters and winning Highest level (Level 21, after the format change) leagues, tournaments...consistent performance against top ranked players like SG, MH...Also active on another servers. Love this MMO Game...will retire soon! 

Saturday, April 15, 2017

रूहानी नाटक (कहानी) #ज़हन


मेरा नाम कृष्णानंद है और लोग मुझे किशन कहकर बुलाते हैं। 9 साल की उम्र में अपने गांव से बिना सोचे लखनऊ आया, वैसे सोचकर भी क्या कर लेता...नौ साल का दिमाग क्या सलाह देता? सीखने में आम बच्चो जैसा नहीं था तो मुझे मंदबुद्धि कहा जाता था, सोने पे सुहागा यह कि मैं हकलाता था। शहर तो आ गया पर यहाँ रहने लायक कोई काम भी तो आना चाहिए था। एक थिएटर उस्ताद ने अपनी शरण में लिया और मैं उनके रंगमंच में साफ़-सफाई, कपड़ो-मंच का रखरखाव जैसे काम करने लगा। दूर से नाटक के कलाकारों को देखते हुए कई बार उनकी टोली में मिल जाने मन किया पर फिर अपनी कमियों को देखकर खुद को रोक लिया। अक्सर सबके जाने के बाद खाली थिएटर में पूरे मन के साथ घंटो अपने बनाये 'शो' करता। ऐसा करते हुए कितने साल बीत गए। आज जब किसी तरह हिम्मत कर के उस्ताद को यह बात बतानी चाही तो पूरी टोली मुझपर हँसने लगी। मेरे बात करने के लहज़े का ना जाने कितना मज़ाक उड़ाया गया। यकीन नहीं हुआ ये सब वही लोग हैं जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने की बातें करते हैं, जागरूकता फैलाते हैं। अब और कितना संघर्ष करूँ? जीवन भर घिसट-घिसट के क्यों बिताऊं? क्या फायदा इन सबके बीच रहकर इस अधूरे जीवन को बिताने का? इस से बढ़िया तो मैं पैदा ही ना हुआ होता! अभी देर नहीं हुई है, मैं खुदखुशी कर लूँगा। 

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"किस ख़ुशी में कर लोगे खुदख़ुशी? हम करने ही नहीं देंगे!"

(**सामने के नज़ारे से किशन की आवाज़ गुम हो गई इसलिए नैरेटर को टेकओवर करना पड़ रहा है।**)

छत के बाहर की ओर टांग लटकाये बैठे किशन को झटका लगा और वह अंदर आकर गिरा। उसके सामने अलग-अलग मानव आकृतियों वाले भूत खड़े थे। उनकी मुखिया एक सुन्दर परी सी आत्मा बोल रही थी। अचानक जैसे उसके मोनोलॉग को सुन रही काल्पनिक प्रकृति जागृत हो गयी। किशन डर से जड़ हो गया। 

"डरो मत किशन! हम सब तुम्हे कुछ बातें बताने आएं हैं। कभी सोचा है रोज़ तुम आराम से उठते थे, हर दूसरे दिन तुम्हे लगता था कि आज तो तुम्हे पक्का देर हो जायेगी पर कभी ऐसा हुआ नहीं। तुम्हारे कमरे का किराया, बिजली-पानी का खर्च तुम्हारी मासिक आय से काट लें तो 50 रुपये बचते हैं...पर जब भी तुम्हारा मन कोई मिठाई, आइस क्रीम खाने को होता, किसी गरीब की मदद करने को होता तो तुम्हारी जेब से ज़रुरत भर के पैसे निकल आते। थिएटर टोली में सब कहते हैं कि किशन कभी बीमार नहीं पड़ता, सही कहते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि तुम्हे कभी चोट भी नहीं लगती। तुम्हारे घर पर हर महीने माँ-बाप के खर्चे लायक मनी आर्डर जाता है....अरे वो तो छोडो, एक मित्र से तुम्हे ना कहने मे दिक्कत हुई और तुमने उस से जीवन बीमा पॉलिसी खरीद ली, फिर भूल गए। उस पॉलिसी का प्रीमियम ढाई साल से हर 3 महीने बिना नागा जमा हो रहा है। कभी सोचा है यह सब कैसे हो रहा है? कौन और क्यों कर रहा है? 

कैसे सोचोगे? तुम बहुत भोले हो! तुम्हारी कला और मन में मिलावट नहीं है। किसी को दिखाने के लिए लोग जो आडम्बर ओढ़ते हैं उससे तुम कोसो दूर हो। हम सब हर रात तुम्हारे नाटक देखने आते हैं। अब तो बाहर के शहरों के भूत तक सिर्फ तुम्हारे लिए यहाँ आते हैं। जब तुम अपने सोचे नाटकों पर माइम करते हुए दर्जन किरदारों के स्वांग रचते हो तो तुम्हारे रचना संसार के आगे बाहर की दुनिया बहुत छोटी लगने लगती है। दिनभर जिस संकोच और शर्म के पीछे कुछ शब्द बोलने से डरते हो, रात में उतनी ही गहनता से हकलाते हुए जब संवाद बोलते हो तो फिर जन्म लेकर तुम्हारे साथ रहने का मन करता है। जिस जीवन को इतनी आसानी से छोड़ने की बात कर रहे हो उसके केवल कुछ क्षणों के लिए हम सब आत्माएं अतृप्त घूम रही हैं।"

किशन का मन हल्का हुआ कि उसकी कला के हज़ारों कद्रदान हैं। उसने फिर से शुरुआत की और कुछ समय बाद अपने रूहानी कद्रदानों की मदद से लखनऊ मे एक सरप्राइज थिएटर शो बुक किया। शो के अनोखे प्रचार से कई वहाँ पहुंचे, जिनमे किशन का उस्ताद और उसकी उत्सुक टोली भी शामिल थी। किशन की मेहनत रंग लाई और सबको अपनी प्रतिभा से चौंकाते हुए उसने एक हिट शो दिया। टोली को अपनी बड़ी भूल का एहसास हुआ और किशन के माइम, कहानी के अनुसार उन लोगो ने कुछ अलग नाटक रचे। अब वह थिएटर किशन के नाम से जाना जाता है। हाँ, आज भी अक्सर किशन रात में खाली फिर भी 'भरे हुए' थिएटर में अपनी नाट्य प्रस्तुति देता है। 

समाप्त!
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

Thursday, April 13, 2017

सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन


जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी....कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया - जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म.... कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में ("अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।") और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए....ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Saturday, April 8, 2017

काश में दबी आह! (कहानी) #ज़हन


स्कूल जाने को तैयार होती शिक्षिका सुरभि पड़ोस के टीवी पर चलता एक गाना सुनकर ठिठक गई। पहले इक्का-दुक्का बार उसे जो भ्रम हुआ था आज तेज़ गाने की आवाज़ ने वो दूर कर दिया। जाने कब वो सब भूलकर सुनते-सुनते उस गाने के बोल पड़ोस के घर के गेट से सटकर गुनगुनाने लगी। अपनी धुन में मगन सुरभि का ध्यान पडोसी की 4 साल की बेटी पीहू के अवाक चेहरे पर गया और वह मुस्कुराते हुए सामान्य होकर वहाँ से स्कूल की तरफ बढ़ चली। आज स्कूल में सुरभि का मन नहीं लग रहा था, वो तो यादों के सागर में गोते लगा रही थी। किस तरह वह अपने गायक, गिटारिस्ट बॉयफ्रेंड घनश्याम के गानों, रियाज़ को घंटो सुना करती थी। उसके दर्जनों गानों के बोल सुरभि को आज भी याद थे। 

ज़िन्दगी को सुलझाते हुए जाने कब दोनों का रिश्ता उलझ गया और अपने सपनो का पीछा करता घनश्याम सुरभि से अलग हो गया। सुरभि में अपने परिवार से बग़ावत करने की हिम्मत नहीं थी। दूर जाने का दर्द तो दोनों को बहुत था पर अक्सर चल रहे पल इंसान के सामने कुछ ऐसे दांव रखते हैं कि बीते लम्हों की याद आने में काफी समय लग जाता है। कभी दो जिस्म, एक जान यह जोड़ा अब एकल जीवन में व्यस्त एक-दूसरे के संपर्क में भी नहीं था।  दोनों का लगा शायद वक़्त एक मौका और देगा पर कुछ सालों बाद सुरभि की शादी हो गई। आज वो खुश थी कि देर से सही पर कम से कम उसके पूर्व प्रेमी को अपनी मंज़िल तो मिली। शाम को लौटकर सबसे पहले उसने इंटरनेट पर इन गानों और घनश्याम का नाम ढूँढा। सुरभि हैरान थी कि इन गानों के साथ घनश्याम का नाम कहीं नहीं था। उसे लगा शायद घनश्याम ने मायानगरी जाकर अपना नाम बदल लिया हो पर गायको, म्यूजिक टीम की तस्वीरों, वीडिओज़ में घनश्याम कहीं नहीं था। सुरभि के आँसुओं की धारा में एक से अधिक दुख बह रहे थे। प्यार को जलाकर रिश्ते की आँच पर जो सपने पकायें थे उनके व्यर्थ जाने का दुख, घनश्याम की तरह हिम्मत ना दिखाने का दुख, उसका प्रेमी ज़िंदा भी है या नहीं यह तक ना जान पाने की टीस... 

उधर लालगंज से दूर फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी की दूकान पर खरीददार महिला को कंगन पहनाते घनश्याम के कानो पर रेडियो में किसी और द्वारा गाये अपने गानों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। उसकी आँखों की तरह उसकी बातें भी पत्थर बन चुकी थीं। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, March 26, 2017

तेरे प्यार के बही-खाते...(नज़्म) #ज़हन


जुबां का वायदा किया तूने
कच्चा हिसाब मान लिया मैंने,
कहाँ है बातों से जादू टोना करने वाले?
तेरी कमली का मज़ाक उड़ा रहे दुनियावाले... 
रोज़ लानत देकर जाते,
तेरे प्यार के बही-खाते...

तेरी राख के बदले समंदर से सीपी मोल ली,
सुकून की एक नींद को अपनी 3 यादें तोल दी।
इस से अच्छा तो बेवफा हो जाते,
कहीं ज़िंदा होने के मिल जाते दिलासे।
जाने पहचाने रस्ते पर लुक्का-छिपी खिलाते,
तेरे प्यार के बही-खाते...

फिर तेरे हाथ पकड़ आँगन से आसमान तक लकीरें मिला लूँ,
दिल पर चेहरा लगा कर नम नज़रों से तेरा सीना सींच दूँ... 
पीठ पीछे हँसने वालो के मुँह पर मंगल गा लूँ,
इस दफा फ़रिश्ते लेने आयें...तो पीछे से टोक लगा दूँ। 
काश अगले जन्म तक बढ़ पाते,
तेरे प्यार के बही-खाते...

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Last Nazm in Kavya Comic Jug Jug Maro

Monday, March 20, 2017

माहौल बनाना (कहानी) #ज़हन

Art - Harikant Dubey

वृद्ध लेखक रंजीत शुक्ला की अपने पोते हरमन से बहुत जमती थी। जहाँ नयी पीढ़ी के पास अपनों के अलावा हर किसी के लिए समय होता है वहाँ हरमन का रोज़ अपने दादा जी के साथ समय बिताना जानने वालो के लिए एक सुखद आश्चर्य था। बातों से बातें निकलती और लंबी चर्चा खिंचती चली जाती। एक दिन हरमन ने रंजीत से पूछा कि उन्हें अपने जीवन में किस चीज़ का मलाल है। 

रंजीत गंभीर मुद्रा में कुछ सोचकर बोले - "कठिन सवाल है! इतने वर्षो में जाने कितनी गलतियाँ की हैं जिनपर सोचता हूँ कि उस समय कोई और निर्णय लिया होता तो अबतक जीवन कितना अलग होता फिर सोचता हूँ कि जिन बातों पर पछता रहा हूँ अगर वो ना की होती तो क्या आज, अबतक 'मैं' वाकई 'मैं' रहता? एक राह चुनने पर दूसरी राहों को छोड़ने का मलाल स्वाभाविक है।"

हरमन - "यानी मलाल हैं भी और नहीं भी? बड़ी अजीब स्थिति हो गयी ये तो। मुझे लगा जीवन के इस पड़ाव पर आपका हर जवाब निश्चित हो गया होगा।"

रंजीत - "वैसे एक चीज़ और रह गई। अपनी ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से मेरी एक आदत के कारण मैंने अनेक अवसर गंवाएं होंगे। वो आदत थी, किसी भी काम को करने के लिए माहौल बनाने की आदत।"

हरमन - "मैं समझा नहीं! माहौल मतलब?"

रंजीत - "मतलब हर बड़े काम को करने या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले सभी बातें मेरे अनुकूल बनाने या उनके अनुकूल होने का इंतज़ार करना। मान लो मुझे कार खरीदनी है। तो कभी मार्किट के ठीक होने का इंतज़ार करना, कभी नौकरी बदलने या प्रमोशन की बाट जोहना, कभी सोचना इस शहर के हिसाब से मेरी पसंद की गाडी ठीक नहीं...एक बात को इतना टाल देना कि या तो वो साकार ही ना हो पाए या उसके पूरे होने पर मज़ा ना आये, एक अधूरापन लगे। इसी तरह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, घर लेने के निर्णय में, कोई किताब शुरू करने से पहले या निवेश में सभी आंतरिक और बाहरी घटकों के मेरे हिसाब से हो जाने का इंतज़ार करना। कभी कभार ऐसा करना गलत नहीं पर इसे एक आदत बना लेने से हम अपनी मेहनत से अधिक अपने भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं क्योकि जो बस के बाहर है उस स्थिति पर मन मसोस कर रह जाना सही नहीं।"

हरमन - "चलिए, मैं आज यह शपथ लेता हूँ कि पार्टी के अलावा कहीं माहौल नहीं बनाऊंगा...हा हा हा।"

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster